अडूसा वनस्पति विषयी आयुर्वेदिक जानकारी
Adulasa vanaspati information in Hindi
चक्रवाक ऋषियों के मत अनुसार
अर्थ : जब तक वासा अर्थात अडूसा यह औषधीय वनस्पति इस सजीव सृष्टि में है, तब तक जीवन की आशा बनी रहती है।
• हिंदी नाम : अडूसा, अडाल्सो
• मराठी नाम : अडुळसा, अडोसा, अडूसा, वासा
• अंग्रेजी नाम : मलबार नट (Malbar nut)
• संस्कृत नाम : सिंहिका, वसाका, अटरूष
• स्थान : भारत, श्रीलंका, आग्नेय एशिया
• प्रकार : सदाहरित
अडूसा वृक्ष के प्रकार :
1. हरा अडूसा
2. लाल अडूसा l
• ऊँचाई : यह एक झाड़ी है, जो 1.2 से 2.5 मीटर तक बढ़ती है। कई स्थानों पर बाड़ (कुंपण) बनाने में इसका उपयोग किया जाता है।
• तना (खोड) :
इसके तने पतली–पतली कठोर लकड़ी जैसी टहनियों के रूप में होते हैं। मुख्य तना थोड़ा मोटा होता है और उससे छोटी–छोटी शाखाएँ निकलती हैं। इन्हीं पर पत्ते और फूल उगते हैं।
• पत्तियाँ :
अडूसा की पत्तियाँ लंबवर्तुलाकार होती हैं। रंग गहरा हरा या पोपटी होता है। आकार भाले की नोक जैसी होती हैं।
• फूल :
फूल शाखाओं के शीर्ष पर ऐसे आते हैं जैसे एक-दूसरे में रखे हुए खोखे (कोष) हों। इनका रंग सफेद होता है।
• फल :
फल बोंडे (फली) जैसे, नुकीले और गोल आकार के होते हैं।
• गुणधर्म :
लघु, रूक्ष, शीत।
अडूसा वनस्पति के आयुर्वेदिक उपयोग :
• रक्तपित्त, क्षय रोग में अडूसा अत्यंत उपयोगी है।
• अधिक जागरण से शरीर में पित्त बढ़ता है जिससे रक्तपित्त होता है।
• बवासीर (मूळव्याध) में रक्तस्राव, नाक-कान से खून आना, तथा पित्त की गर्मी बढ़ने पर अडूसा सेवन लाभकारी है।
• सर्दी, ताप, खाँसी में अडूसा पत्तों का काढ़ा दिन में 3–4 बार 4–5 दिन तक लेने से आराम मिलता है।
• अतिसार, त्वचा रोग व खुजली में—अडूसा पत्तों का रस निकालकर उसमें मधु मिलाकर लेने से लाभ होता है।
• अडूसा की जड़—गर्भ निष्क्रमणोपयोगी, लू (उन्हाळा), स्वेदपदर जैसे रोगों में उपयोगी।
• त्वचा पर लेप लगाने से त्वचा उजली होती है।
• सिरदर्द में पत्तों का लेप माथे पर लगाने से आराम मिलता है।
• कफ सिरप बनाने में अडूसा पत्तों का उपयोग होता है।
• उष्णता बढ़ना, लू लगना, कावीळ (पीलिया) में अडूसा पत्तों व फूलों का काढ़ा लाभदायक।
• रक्तसंचार सुधारने में पत्ते व फूलों का रस लाभकारी।
• दमा (Asthma) में—अडूसा पत्तों की विडी बनाकर धूम्र सेवन करने से कफ पतला होकर बाहर निकलता है और दमा में राहत मिलती है।
• पत्ते + फूलों का रस + मध + पिंपली चूर्ण
का चटण (चटनी) खाँसी, सर्दी, ताप में उपयोगी।
• क्षय रोग (TB) में :
2 चम्मच पत्तों का रस + यष्टिमधु मिलाकर अष्टमांश काढ़ा बनाते हैं—क्षय में लाभदायक।
• कावीळ व रक्तपित्त में :
पत्तों का रस + 2 चम्मच मध + 50 ग्राम शक्कर मिलाकर बनाए गए द्रव का सेवन लाभदायक।
• अडूसा की जड़ की छाल + मध = रक्तपित्त में उपयोगी।
• संधिवात में :
अडूसा पत्तों का लेप दर्द वाली जगह पर लगाने से आराम मिलता है।
• त्वचा विकार, खुजली, खरुज में :
अडूसा पत्तों का लेप + आमहल्दी लगाने से लाभ।
अडूसा उकला हुआ पानी से स्नान करने पर भी खरुज कम होती है।
• कफ नाशक:
अडूसा पत्ती का रस + मध एक महीने लेने से कफ निकल जाता है।
• जंतुनाशक:
अतिसार (दस्त) में पत्तों का रस व काढ़ा लाभदायक।
• सूखी खाँसी में :
अडूसा पत्तों को सेककर निकाला रस + मध लाभकारी।
• लघवी बंद होना / रुकावट—
पत्तों का रस 7–8 दिन लेने से लघवी सुचारू होती हैl
• मलेरिया में :
अडूसा पत्ते व विडी के पत्तों का धुआँ करने से लाभ।
अडूसा वनस्पति का सेवन कैसे करें ?
• काढ़ा, लेप, रस—सभी रूप में लाभदायक।
• काढ़ा बनाते समय पकी हुई पीली पत्तियाँ उपयोग की जाती हैं।
• काढ़ा बनाने में मिश्रण :
अडूसा पत्ते + अदरक + तुलसी + करेला + काली मिर्च + हल्दी + दालचीनी
इन सभी को पानी में उबालकर काढ़ा तैयार किया जाता है।
• अडूसा का चटण :
पत्ते व फूलों का रस + मध + पिंपली चूर्ण मिलाकर चटण बनाकर सेवन।
ऐसी है अडूसा वनस्पति विषयी आयुर्वेदिक जानकारी व उपयोग
Adulasa vanaspati information in Hindi



