एरंड (Erand) वनस्पति की आयुर्वेदिक जानकारी
Erand / Castor Bean Plant Information in Hindi
🔹 मराठी नाव : एरंड.
🔹 हिंदी नाव : एरंड
🔹 इंग्रजी नाव : Castor Bean Plant
🔹 लॅटिन / वैज्ञानिक नाव : Ricinus communis
🔹 कुल (Family) : Euphorbiaceae
🔹 स्थान (Habitat) :
यह वनस्पति एशिया और अफ्रीका महाद्वीप में पाई जाती है।
एरंड वनस्पति की वृद्धि (Growth)
यह एक छोटी झाड़ी के आकार की वनस्पति है।
इस वनस्पति की ऊँचाई लगभग 2 से 4 मीटर तक होती है।
• यह वनस्पति जंगलों में, खुले मैदानों में तथा खेतों के किनारे सामान्यतः पाई जाती है।
एरंड वनस्पति की रचना (Plant Description)
🔹 तना / खोड (Stem) :
इस वनस्पति का तना पतली नली के समान होता है, जिस पर गांठें (पेरे) होती हैं।
इसकी बनावट गन्ने के डंठल जैसी दिखाई देती है।
🔹 पत्तियाँ (Leaves) :
एरंड की पत्तियाँ छत्री के समान तथा चांदनी जैसी प्रतीत होती हैं।
पत्तियाँ मध्य भाग से शिराओं द्वारा जुड़ी होती हैं।
इनका रंग गहरा हरा या तांबई (लालिमा लिए) होता है।
🔹 फल (Fruit) :
इस वनस्पति के फल छोटे तथा कांटेदार होते हैं।
हालाँकि इसके कांटे मुलायम होते हैं, जो बीज प्रसार में सहायक होते हैं।
🔹 बीज (Seeds) :
फल के अंदर कई खंड दिखाई देते हैं।
इन खंडों में काले रंग के बीज होते हैं।
बीजों पर सफ़ेद रंग की धारियाँ दिखाई देती हैं।
इन बीजों को एरंडी कहा जाता है।
एरंड वनस्पति के प्रकार
🔸 छोटे आकार की एरंड :
इस प्रकार में एरंड का पौधा आकार में छोटा होता है।
इसके बीजों के तेल तथा जड़ों का औषधि में उपयोग किया जाता है।
🔸 तांबड़ी एरंड :
इस प्रकार का तेल तीव्र और उग्र होता है।
इसका उपयोग औषधियों में किया जाता है।
🔸 वर्षायु एरंड :
जो एरंड वनस्पति एक वर्ष तक जीवित रहती है, उसे वर्षायु एरंड कहते हैं।
🔸 दीर्घायु एरंड :
जो एरंड वनस्पति अधिक वर्षों तक जीवित रहती है।
एरंड वनस्पति के आयुर्वेदिक उपयोग
Ayurvedic Uses of Erand / Castor Oil
• एरंड का तेल कड़वा, तिक्त, मधुर-सा तथा चिकना होता है।
• यदि पेट साफ न होता हो, तो सुबह खाली पेट एरंड तेल का सेवन किया जाता है।
इसे गर्म पानी या सादी चाय में मिलाकर लेने से पेट साफ होता है।
• कमर दर्द, पीठ दर्द तथा अन्य वात विकारों में एरंड तेल से मालिश करने पर वात दोष कम होता है।
• आमवात रोग में एरंड तेल का सेवन करने से अच्छा लाभ होता है, भूख बढ़ती है और वात विकार शांत होता है।
• तीक्ष्ण गुण होने के कारण एरंड तेल पूरे शरीर में फैलता है, इसलिए विरेचन क्रिया में इसका उपयोग किया जाता है।
• शरीर में जगह-जगह गांठें होने पर एरंड तेल का नियमित सेवन और ऊपर से मालिश करने पर गांठें गलने लगती हैं और शरीर निरोगी होता है।
• बार-बार बुखार आना, पेट के विकार, उदरशूल तथा मल का जमाव होने पर एरंड तेल लेने से शरीर की शुद्धि होती है।
• एरंड तेल से बुद्धि और स्मरण शक्ति बढ़ती है।
• सुश्रुताचार्य के अनुसार एरंड तेल वयःस्थापक, कामवर्धक तथा शुक्रधातु को बढ़ाने वाला है।
• एरंड तेल सामर्थ्य, शक्ति और बल बढ़ाने वाला होता है।
नियमित सेवन से कांति बढ़ती है तथा त्वचा और बालों के लिए भी लाभकारी होता है।
• पित्त बढ़ना और छाती में जलन होने पर एरंड तेल का सेवन किया जाता है।
• एरंड तेल बच्चों से लेकर बड़ों तक के लिए उपयोगी है।
सुबह खाली पेट 6 मिली तेल लगातार 3 दिन लेने से शरीर पूरी तरह शुद्ध होता है।
• एरंड तेल विशेष रूप से वर्ष में शरद और वसंत ऋतु में लिया जाता है।
इस समय शरीर में उष्णता बढ़ती है, इसलिए इस काल में एरंड तेल सेवन लाभदायक होता है।
• एरंड तेल को चाय, गर्म पानी या नींबू पानी में मिलाकर लेना चाहिए।
• तीन दिन विरेचन करने के बाद हल्का आहार लेना चाहिए।
जैसे – छाछ-भात या पतली पेज।
• एरंड वनस्पति बड़े स्तर पर कीट नियंत्रण का कार्य करती है।
इसलिए किसान खेत की मेड़ पर एरंड लगाते हैं और फसलों की रक्षा करते हैं।
🌿 निष्कर्ष
इस प्रकार एरंड (Erand / Castor Bean Plant) एक अत्यंत उपयोगी, बहुगुणी और आयुर्वेद में महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पति है।
एरंड (Erand) वनस्पति की आयुर्वेदिक जानकारी
Erand / Castor Bean Plant Information in Hindi


























