🌳 पीपल वृक्ष की जानकारी
(Pipal Tree Information in Hindi)
स्थान :
हिमालय पर्वत क्षेत्र से लेकर कन्याकुमारी तक भारत में सर्वत्र पाया जाने वाला वृक्ष अर्थात पीपल का वृक्ष अत्यंत विशेष महत्व रखता है।
ऊँचाई :
पीपल वृक्ष बहुवर्षीय होता है तथा यह लगभग 10 से 15 मीटर तक ऊँचा बढ़ता है।
• पीपल के पेड़ का तना सफ़ेद, गुलाबी तथा लालिमा लिए हुए, चिकना स्पर्श वाला और रेशेदार होता है।
पत्तियाँ :
• पीपल की पत्तियाँ हृदयाकार होती हैं तथा उनके डंठल लंबे होते हैं।
• कोमल पत्तियाँ देखने में रेशमी गुलाबी रंग की होती हैं, जो धीरे-धीरे तांबई होकर बाद में हरी दिखाई देती हैं।
• प्रारंभ में आने वाले अंकुर अनेक उपपर्णों से ढके रहते हैं।
फूल व फल :
• पीपल के फूल हरे रंग के, गोल एवं गोलाकार होते हैं।
• इनमें पुष्पाशय विकसित होता है।
• ये पत्तियों के डंठल तथा शाखाओं के गुच्छों में विकसित होते हैं।
• इनमें कुछ नर पुष्प तथा कुछ मादा पुष्प होते हैं।
• नर पुष्प तीन पंखुड़ियों वाले तथा मादा पुष्प पाँच पंखुड़ियों वाले होते हैं।
• कीट-पतंगे इन पर मंडराते हैं, जिससे परागण होकर फल लगते हैं।
• पीपल के फल छोटे, नली के आकार के होते हैं, जिन्हें पकने पर पक्षी बड़े चाव से खाते हैं।
बीज प्रसार :
पक्षियों द्वारा खाए गए फलों के बीजों का आवरण उनके पेट की गर्मी से नष्ट हो जाता है।
जहाँ-जहाँ पक्षी मल त्याग करते हैं, वहाँ वर्षा ऋतु शुरू होते ही बीज अंकुरित हो जाते हैं।
इसी कारण पीपल के पेड़ कभी दीवारों पर, कभी छतों पर, तो कभी घरों के पास उगते हुए दिखाई देते हैं।
🌿 पीपल वृक्ष के औषधीय उपयोग :
• पीपल के पत्ते बद्धकोष्ठता, अतिसार तथा रक्त संबंधी समस्याओं में लाभकारी होते हैं।
• पत्ते तोड़ने पर निकलने वाला दूधिया रस आँखों में डालने से नेत्र पीड़ा में आराम मिलता है।
• मानसिक रोग या उन्माद के दौरे आने पर पीपल की कोमल शाखाओं को उबालकर उसका पानी पीने से दौरे कम होते हैं।
• पीपल की टहनी को दंतमंजन ब्रश की तरह उपयोग करने से दाँत व मसूड़े मजबूत होते हैं।
• नाक से रक्तस्राव होने पर पीपल के कोमल पत्तों का सेवन करने से शीघ्र आराम मिलता है।
• पीपल के पत्ते बाँझपन को कम करने में सहायक होते हैं।
• पीपल की शाखा के सिरे को दूध में उबालकर पीने से संतान प्राप्ति में सहायता मिलती है।
• पीपल के कोमल पत्तों का काढ़ा पीने से त्वचा का संवर्धन होता है।
🌿 पीपल की छाल :
• पीपल की छाल में टैनिन नामक रसायन होता है, जो वेदनाशामक है तथा घाव भरने में सहायक होता है।
• पीपल की छाल मधुर, शीतल, कफनाशक, रक्तसंग्राहक, गर्भस्थापक एवं मूत्रल होती है।
• यह घावों को शीघ्र भरने का कार्य करती है।
• पीपल की छाल का रस 20 से 30 मिली लेने से खाँसी में लाभ होता है।
• पीपल की छाल का लेप घाव या कटे स्थान पर लगाने से भरने में सहायता मिलती है।
• सूखी छाल की राख पानी में मिलाकर पीने से मितली व उल्टी रुकती है।
• पीपल की छाल का रस पीलिया रोग में उपयोगी होता है।
• पीपल के फल सौम्य एवं रुचिकर होने के कारण पेट की समस्याओं में लाभकारी होते हैं।
• सूखे फलों का बारीक चूर्ण मासिक धर्म के बाद लगातार 15 दिन सेवन करने से गर्भधारण में सहायता मिलती है।
• पुरुष द्वारा फलों का चूर्ण दूध के साथ नियमित सेवन करने से बलवृद्धि, वीर्यवृद्धि, पौरुष बढ़ता है तथा नपुंसकता कम होती है।
• सूखे बीज शहद के साथ खाने से रक्तशुद्धि होती है।
🕉️ पीपल वृक्ष का धार्मिक महत्व :
• हिंदू धर्म में पीपल वृक्ष को ब्रह्मस्वरूप माना गया है।
• भगवान श्रीकृष्ण ने इसे सत्य का वृक्ष कहा है।
• पीपल की जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास माना जाता है।
• श्री विष्णु देवता पीपल के पत्तों में निवास करते हैं।
• अथर्ववेद नामक हिंदू ग्रंथ में इसे अश्वत्थ वृक्ष कहा गया है।
• पुष्य नक्षत्र का यह आराध्य वृक्ष है।
• मान्यता है कि इस वृक्ष के नीचे हनुमान जी का वास होता है, इसलिए इसे काटना पाप माना जाता है।
• हड़प्पा कालीन सिक्कों पर पीपल पत्ते की आकृति मिलने से इसकी प्राचीनता सिद्ध होती है।
• बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध को उरुवेला (बोधगया) में पीपल वृक्ष के नीचे दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी, इसलिए इसे तपवृक्ष भी कहा जाता है।
• बौद्ध धर्म में इस वृक्ष का विशेष धार्मिक महत्व है।
• बौद्ध भिक्षु पीपल की छाल के रस से अपने वस्त्र रंगते हैं और उन्हीं वस्त्रों का उपयोग करते हैं।
🌳 इस प्रकार है पीपल वृक्ष की संपूर्ण जानकारी।








































